
नयागांव (सारण)
गंगा-गंडक के संगम के पास लगने वाला विश्वविख्यात हरिहर क्षेत्र सोनपुर मेला केवल धार्मिक आस्था और पशु व्यापार के लिए ही प्रसिद्ध नहीं रहा, बल्कि इसने किसानों के अधिकारों की लड़ाई को भी नई पहचान दी। कभी जंगी हाथियों और घोड़ों की खरीद-बिक्री से चर्चा में रहने वाला यह मेला अंग्रेजी शासन के दौर में किसान आंदोलन और राजनीतिक जागरूकता का मंच बना।
यहां जुटने वाली भीड़ ने व्यापार के साथ विचारों के आदान-प्रदान का रास्ता भी खोला। इस साल मेला 22 नवंबर से 23 दिसंबर तक आयोजित होगा।
जंगी हाथियों और घोड़ों के कारोबार से बनी पहचान
सोनपुर मेले की ऐतिहासिक पहचान इसके विशाल पशु बाजार से जुड़ी रही है। देश के अलग-अलग हिस्सों से व्यापारी और खरीदार हाथियों, घोड़ों, बैलों सहित अन्य पशुओं की खरीद-बिक्री के लिए यहां पहुंचते थे।
पुराने समय में युद्ध और सैन्य गतिविधियों में हाथियों व घोड़ों की अहम भूमिका होने के कारण इनके व्यापार का विशेष महत्व था।
मेले से जुड़ी जनश्रुतियों में चंद्रगुप्त मौर्य, मुगल बादशाह अकबर और वीर कुंवर सिंह के नाम भी लिए जाते हैं, हालांकि इन दावों के लिए ठोस ऐतिहासिक प्रमाणों की पुष्टि जरूरी है।
जब पशु बाजार बना किसानों की आवाज का मंच
अंग्रेजी शासन के दौरान किसानों को ऊंचे लगान और जमींदारी शोषण जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता था। ऐसे समय में सोनपुर मेले की विशाल भीड़ किसान नेताओं के लिए लोगों तक अपनी बात पहुंचाने का महत्वपूर्ण अवसर बनी।
स्वामी सहजानंद सरस्वती ने किसानों को संगठित करने और उनके अधिकारों की आवाज उठाने में अहम भूमिका निभाई। मेले में होने वाले किसान सम्मेलनों ने कृषि से जुड़े सवालों को व्यापक चर्चा का विषय बनाया।
17 नवंबर 1929 को बिहार राज्य किसान सभा की स्थापना
सोनपुर मेले के इतिहास में 17 नवंबर 1929 की तारीख खास महत्व रखती है। इसी दिन यहां बिहार राज्य किसान सभा की स्थापना हुई थी।
स्वामी सहजानंद सरस्वती इसके प्रथम अध्यक्ष और डॉ. श्रीकृष्ण सिंह महामंत्री बने। इस पहल ने बिहार में किसान आंदोलन को संगठित स्वरूप देने में योगदान दिया। आगे चलकर किसान आंदोलन का विस्तार हुआ और 1936 में लखनऊ में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना हुई।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में भी बनी रही अहमियत
सोनपुर मेला ब्रिटिश शासन के दौरान सामाजिक और राजनीतिक विचारों के प्रसार का माध्यम भी रहा। ऐतिहासिक विवरणों में 1908 में सोनपुर में हुई एक बैठक का उल्लेख मिलता है, जिसे बिहार में कांग्रेस संगठन के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जाता है।
मेले में बड़ी संख्या में लोगों के जुटने से नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जनसंपर्क का अवसर मिलता था। इस तरह सोनपुर की पहचान पशु व्यापार से आगे बढ़कर जनजागरण से भी जुड़ गई।
हरिहरनाथ मंदिर और गज-ग्राह की कथा से धार्मिक पहचान
सोनपुर मेले की पहचान भगवान हरिहरनाथ मंदिर और गज-ग्राह की पौराणिक कथा से भी जुड़ी है। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर गंगा-गंडक के संगम में स्नान और मंदिर में दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
धार्मिक आस्था के साथ मेले में व्यापार, प्रदर्शनियों और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी विस्तार हुआ है। यही विविधता इसे दूसरे मेलों से अलग पहचान देती है।
आज भी इतिहास, आस्था और परंपरा का संगम
समय के साथ सोनपुर मेले के पशु बाजार का स्वरूप बदला है, लेकिन इसकी ऐतिहासिक पहचान कायम है। एक ओर यहां धार्मिक परंपराएं जीवित हैं, तो दूसरी ओर यह मेला बिहार के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक इतिहास की याद दिलाता है।
जंगी हाथियों के कारोबार से लेकर किसानों के संगठित संघर्ष तक, सोनपुर मेले की कहानी बताती है कि यह आयोजन सिर्फ खरीद-बिक्री का बाजार नहीं, बल्कि जनजीवन और बदलावों का भी साक्षी रहा है।



