
जबलपुर
मानसिक रूप से असक्षम युवती के साथ दुष्कर्म के मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में सुनवाई हुई. यहां सुनवाई के दौरान दुष्कर्म पीड़िता के बच्चे से आरोपी का डीएनए मिलान नहीं हुआ, जिसके बाद आरोपी को हाईकोर्ट से राहत मिली है. हाईकोर्ट जस्टिस देवनारायण मिश्रा की एकलपीठ ने इस मामले में सुनवाई की।
मानसिक अक्षम युवती से दुष्कर्म के आरोप
लखनादौन जिला सिवनी निवासी छोटू टेकाम पर पड़ोस में रहने वाली मानसिक रूप से असक्षम युवती के साथ दुष्कर्म के आरोप लगे थे. जिसके बाद उसे जिला न्यायालय द्वारा दस साल की सजा से दंडित किया गया था. इस सजा के खिलाफ आरोपी की ओर से हाईकोर्ट में अपील दायर की गई थी. अपील में कहा गया था कि अभियोजन के अनुसार युवती के माता-पिता कार्य के लिए नागपुर गए थे और जब नागपुर से लौटे तो उन्होंने पाया कि उनकी मानसिक रूप से अक्षम बेटी गर्भवती हो गई है।
आरोपी को हुई थी 10 साल की हुई थी सजा
याचिका में बताया गया कि बेटी के गर्भवती होने पर उसके मां-बाप ने पड़ोसी होने के कारण आरोपी के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करवा दी. युवती ने भी अपने बयान में उसके खिलाफ गवाही दी, जिसके बाद पुलिस ने उसके खिलाफ प्रकरण दर्ज कर लिया और जिला न्यायालय ने विभिन्न धाराओं के तहत अधिकतम दस साल की सजा से दंडित कर दिया. इस दौरान अपीलकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि पीड़ित द्वारा जन्म दिए गए बच्चे और आरोपी का डीएनए ही आपस में नही मिलता, जिससे स्पष्ट है कि वह उस बच्चे का जैविक पिता नही है।
पीड़िता के बच्चे से डीएनए मिलान नहीं हुआ, दोषमुक्त करार
एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि डीएनए रिपोर्ट के अनुसार पीड़ित व नवजात बच्चे का डीएनए आपस में मिलते है, लेकिन दुष्कर्म के आरोपी का डीएनए नवजात बच्चे के डीएनए से नहीं मिलता. ऐसे हाईकोर्ट जस्टिस देवनारायण मिश्रा की एकलपीठ ने तकनीकी साक्ष्य नहीं होने के कारण अपीलकर्ता को संदेह के आधार पर दोषमुक्त करार दिया है. एकलपीठ ने वैज्ञानिक साक्ष्य नहीं होने के कारण अपीलकर्ता को संदेह का लाभ देते हुए उसे दोषमुक्त कर दिया।



