बेटियों ने बदली अलखपुरा की पहचान, 170 अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल खिलाड़ी बनाकर बना ‘मिनी ब्राजील’

भिवानी.

जैसे-जैसे फीफा वर्ल्ड कप के समापन के दिन करीब आ रहे हैं, पूरी दुनिया में फुटबाल फीवर बढ़ता ही जा रहा है। फुटबाल के इस खुमार के बीच आइए आज चलते हैं, हरियाणा के भिवानी जिले के अलखपुरा गांव, जिसे मिनी ब्राजील कहा जाता है और साथ ही चलते हैं यहीं के हिसार जिले के मंगाली गांव, इसे भी फुटबाल का केंद्र कहा जाता है।

लगभग पूरी दुनिया इन दिनों फुटबाल विश्वकप के रोमांच में डूबी है, लेकिन भिवानी जिले के अलखपुरा में फुटबाल किसी टूर्नामेंट का मोहताज नहीं है। यहां पर सुबह साढ़े पांच बजे ही गांव का खेल मैदान खिलाड़ियों के आने से जीवंत हो उठता है। यहां 248 बेटियां एक साथ वार्मअप करती हैं और गेंद पर नियंत्रण साधती हैं। इसके बाद फुटबाल की कोच सोनिका बिजारणियां की सीटी के साथ अभ्यास की रफ्तार तेज हो जाती है। मैदान के बाहर खड़े अभिभावकों की नजर भी अपनी बेटियों पर ही होती है। यही कारण है कि अलखपुरा अब केवल गांव नहीं, बल्कि पूरे देश में 'मिनी ब्राजील' के नाम से पहचाना जाता है। करीब दो दशक पहले पीटीआइ गोवर्धन ने जिस पौध को लगाया था, वह आज 150 राष्ट्रीय, 30 अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों और 70 से अधिक सरकारी नौकरियों का वटवृक्ष बन चुका है। अलखपुरा गांव की सात बेटियां आज सरकारी कोच हैं और नई पीढ़ी को खेल मैदान से उड़ान दे रही हैं।

पूरा गांव फुटबाल को जीता है
करीब 13 वर्ष से बेटियों को प्रशिक्षण दे रहीं कोच सोनिका बिजारणियां कहती हैं कि इन दिनों गांव में राष्ट्रीय प्रशिक्षण शिविर चल रहा है। इसी शनिवार को दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में साई के साथ फ्रेंडली मैच है और अगले सप्ताह 19 जुलाई को नारायणगढ़ में अलखपुरा हाप्स का मुकाबला है। सीमित संसाधनों के बावजूद खिलाड़ियों ने अपने पैसों से ग्रास कटर खरीदा और मैदान में पानी की व्यवस्था की।

सबके सपने हैं अलग
स्नातक कर चुकीं अलखपुरा की अंजली कहती हैं, मैं सात बहनों और एक भाई वाले परिवार से हूं। मैं करीब नौ वर्ष पहले गांव की बड़ी खिलाड़ियों को देखकर मैदान में उतरी थी। मेरा सपना अब परिवार का सहारा बनने का है। स्नातक की छात्रा संजना फुटबाल खेलने के लिए अपने मामा के घर अलखपुरा आई हैं। संजना कहती हैं, मैंने अलखपुरा गांव के बारे में बहुत सुन रखा था, यहां आकर लगा कि सचमुच हर घर में फुटबाल बसता है। इसी प्रकार से बीए प्रथम वर्ष की छात्रा साक्षी को उनकी बुआ तीन साल की उम्र में ही यहां लेकर आ गई थीं। अब साक्षी का लक्ष्य फुटबाल के साथ ही प्रथम श्रेणी की अधिकारी बनना है।

पापा डांटकर मैदान भेजते थे
12वीं की छात्रा ऋषिका संयुक्त परिवार से हैं। वह कहती हैं कि पिता डांटकर मुझे अभ्यास के लिए भेजते थे, क्योंकि उन्होंने गांव की बेटियों को खेल के दम पर नौकरी पाते देखा था। अन्य खिलाड़ियों को देखते-देखते अब मेरे मन में भी बस एक ही चाह है कि मैं एक दिन भारतीय टीम के लिए खेलूं। बीए द्वितीय वर्ष की छात्रा पारुल अपनी बड़ी बहन को खेल के दम पर नौकरी मिलते देखकर मैदान में आई हैं। वहीं 12वीं तक पढ़ाई कर चुकीं श्वेता जाखड़, जो अंडर-17 सैफ प्रतियोगिता में भारतीय टीम की कप्तान रह चुकी हैं और इंडियन विमेन लीग में इंडियन एरोज की भी कप्तानी कर चुकी हैं, आज गांव की छोटी खिलाड़ियों की सबसे बड़ी प्रेरणा हैं।

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