Ambala में BJP का नया समीकरण: पुराने-नए चेहरों का मिश्रण, बाहरी प्रत्याशियों को भी टिकट

अंबाला शहर.

लंबे इंतजार के बाद वीरवार सुबह जैसे ही भाजपा ने 20 वार्डों के अपने पार्षद उम्मीदवारों की सूची जारी की, शहर की सियासत में हलचल तेज हो गई। यह सूची सिर्फ नामों का एलान नहीं, बल्कि उस राजनीतिक प्रयोग का खाका है जिसमें वफादारी से ज्यादा विजय क्षमता को तवज्जो दी गई है।

इस बार का चुनाव सीधे-सीधे भाजपा बनाम कांग्रेस का मुकाबला जरूर दिख रहा है, लेकिन असल कहानी इससे कहीं ज्यादा पेचीदा है। वजह टिकट वितरण में पुराने चेहरों की वापसी, विपक्ष से आए नेताओं को मौका और नए चेहरों पर जोखिम भरा भरोसा। भाजपा की सूची में जिन्हें उम्मीदवार बनाया गया है उनमें 11 ने पिछला चुनाव लड़ा था। इनमें से दो हार गए थे। 9 जितने वालों में एक कांग्रेस और एक हरियाणा जनचेतना पार्टी जोकि भाजपा में विलय हो गई और शेष 7 भाजपाई ही थे। अब जब भाजपा और कांग्रेस दोनों ने अपने-अपने उम्मीदवार मैदान में उतार दिए हैं, तो सियासत का फोकस टिकट से हटकर टक्कर पर आ गया है। हर वार्ड में समीकरण अलग हैं कहीं जातीय गणित, कहीं व्यक्तिगत पकड़, तो कहीं विकास के मुद्दे चुनाव की दिशा तय करेंगे। इस बार का चुनाव एक तरह से हाइब्रिड माडल बन गया है जहां पुराने नेता, नए चेहरे और दल-बदल की राजनीति एक साथ मैदान में है।

पुराने सिपाहियों पर भरोसा, लेकिन पूरी तरह नहीं….
भाजपा ने पिछले चुनाव में जीत दर्ज करने सातों चेहरों को दोबारा मैदान में उतारकर यह संकेत दिया है कि पार्टी अपने विनिंग काम्बिनेशन को पूरी तरह छोड़ने के मूड में नहीं है। मन्नी आनंद, अर्चना छिब्बर, मोनिका मल, मीना ढिंगरा, शोभा पूनिया, हितेष जैन और प्रीति सूद के पति दिनेश सूद, जैसे नाम फिर से टिकट पाकर यह साबित करते हैं कि पार्टी को अपने पुराने प्रदर्शन पर भरोसा है। लेकिन दिलचस्प यह है कि दो जीतने वाले चेहरों को किनारे कर नए समीकरण बनाए गए यहीं से राजनीति का असली खेल शुरू होता है।

दल-बदलुओं पर दांव या मजबूरी…
इस सूची का सबसे बड़ा संदेश है दल बदलने वालों के लिए भाजपा के दरवाजे खुले हैं। कांग्रेस से आए राजेश मेहता, हरियाणा जनचेतना और हरियाणा डेमोक्रेटिक मोर्चों से जुड़े चेहरे, अब भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ेंगे। यह रणनीति साफ करती है कि भाजपा इस बार वोट बैंक इंपोर्ट करने की कोशिश कर रही है।यानी जहां संगठन कमजोर है, वहां विपक्ष के मजबूत चेहरों को शामिल कर सीधे मुकाबले को अपने पक्ष में मोड़ने की तैयारी है।

दोधारी तलवार, पुरानों को टिकट ने मिलने से बेचैनी
लेकिन भाजपा का यह दांव दोधारी तलवार भी है स्थानीय कार्यकर्ताओं में असंतोष और बगावत का खतरा भी उतना ही बड़ा है। पांच पूर्व पार्षदों को टिकट नहीं मिली। इनमें से एक ने तो खुद नामांकन नहीं भरा था, एक ने नामांकन भरा था लेकिन चुनाव नहीं लड़ने की बात भी खुद ही कह दी थी। तीन ऐसे हैं जिन्होंने टिकट मांगी थी लेकिन नहीं मिली। इनमें से एक भाजपा का सबसे पुराना चेहरा भी शामिल है जबकि दो चेहरे हरियाणा जनचेतना से चुनाव जीतने वाले पूर्व पार्षद हैं। लेकिन इनके बदले भाजपा ने इसी पार्टी से जुड़े बाद और अब भाजपा का हिस्सा बने दो अन्य उम्मीदवारों को टिकट देकर संतुलन भी साधने का काम किया है।

परिवारवाद की सॉफ्ट एंट्री
सूची में कुछ ऐसे नाम भी हैं जो सीधे तौर पर नहीं, लेकिन रिश्तों के जरिए राजनीति में उतर रहे हैं। शिवानी सूद और दिनेश सूद, गुरप्रीत साहनी जैसे उदाहरण बताते हैं कि पार्टी अब फैमिली कनेक्शन को भी चुनावी पूंजी मान रही है। यह ट्रेंड बताता है कि स्थानीय पहचान और नेटवर्क को प्राथमिकता दी जा रही है, चाहे उम्मीदवार खुद पहली बार मैदान में क्यों न हो।

गुटबाजी की झलक भी साफ
टिकट वितरण में अलग-अलग गुटों का संतुलन भी नजर आता है। कार्तिकेय शर्मा गुट से जुड़े दो उम्मीदवारों को टिकट मिलना इस बात का संकेत है कि पार्टी ने अंदरूनी समीकरणों को साधने की कोशिश की है। यह संतुलन फिलहाल कागज पर तो ठीक दिखता है, लेकिन चुनावी मैदान में यही गुटबाजी कभी-कभी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है।

नए चेहरों पर रिस्क फैक्टर
करीब 9 नए चेहरों को टिकट देकर भाजपा ने यह भी साफ कर दिया है कि वह सिर्फ पुराने फार्मूले पर निर्भर नहीं रहना चाहती। विशाल राणा, वरखा सहोता, वरिंद्र नाथ, गुरविंद्र सिंह, कविता सैनी, कमल अग्रवाल, बीनू गर्ग, सपना रानी, राजकुमार गुप्ता उम्मीदवारों को मौका देकर पार्टी ने फ्रेश फेस का कार्ड भी खेला है। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये नए चेहरे जमीन पर उतनी ही मजबूती दिखा पाएंगे, जितनी उम्मीद पार्टी कर रही है?

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button