
रांची.
झारखंड की राजनीतिक और सामाजिक हलचल में कुड़मी बनाम आदिवासी का विवाद फिर नए सिरे से उभर रहा है। राज्य में ओबीसी में शुमार कुड़मी समुदाय लंबे समय से अनुसूचित जनजाति (एसटी) श्रेणी में शामिल करने की मांग कर रहा है। इस मांग को लेकर कुड़मी संगठनों ने आंदोलन की कमान संभाली है, जो अब पूरे राज्य में फैल चुका है। रांची से लेकर छोटे-छोटे जिलों तक रैलियों की तैयारी की जा रही है। उधर इसके खिलाफ आदिवासी संगठनों ने परस्पर मोर्चाबंदी की है। इनका तर्क है कि कुड़मी आदिवासी नहीं हैं और उनकी मांग गलत है।
भारत में जब भी किसी समुदाय द्वारा अनुसूचित जनजाति (एसटी) दर्जे की मांग उठती है, तो वह केवल आरक्षण की बहस नहीं होती. वह पहचान, इतिहास और न्याय की बहस बन जाती है. कुर्मी समाज की वर्तमान मांग भी इसी त्रिकोण के बीच खड़ी है. यह प्रश्न भावनाओं से नहीं, बल्कि संविधान, इतिहास और सामाजिक यथार्थ से तय होना चाहिए. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 342 यह स्पष्ट करता है कि एसटी सूची कोई स्थिर या अपरिवर्तनीय सूची नहीं है. यह समय-समय पर सामाजिक, ऐतिहासिक और क्षेत्रीय परिस्थितियों के अनुसार संशोधित की जा सकती है. देश में अनेक समुदाय ऐसे हैं, जिन्हें बाद के वर्षों में एसटी सूची में शामिल किया गया. इसलिए कुड़मी समाज की मांग को “संविधान विरोधी” कह देना स्वयं संविधान की आत्मा, सामाजिक न्याय के विपरीत होगा.
1931 की कलम और आज का संघर्ष
कुर्मी समाज का सबसे बड़ा तर्क यह है कि वे कभी “गैर-आदिवासी” नहीं थे, बल्कि 1931 की ब्रिटिश जनगणना के दौरान प्रशासनिक पुनर्वर्गीकरण के कारण उन्हें आदिवासी श्रेणी से बाहर कर दिया गया. 1872 से 1921 तक की जनगणनाओं में कुर्मी को जनजाति, आदिवासी और पहाड़ी जनजाति जैसी श्रेणियों में रखा गया. 1931 में उन्हें ‘आदिम जनजाति’ से हटाकर ‘खेतीहर’ बना दिया गया, यह किसी सामाजिक परिवर्तन के कारण नहीं, बल्कि ब्रिटिश शासन की प्रशासनिक सुविधा के कारण हुआ. 1950 में जब एसटी सूची बनी, तो आधार 1931 की वही सूची बनी और यहीं से कुर्मी समुदाय एसटी सूची से बाहर रह गया.
लेकिन आदिवासी समाज क्यों चिंतित है?
यह भी उतना ही सच है कि झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और बंगाल के आदिवासी समुदाय इस मांग को लेकर असहज और नाराज हैं. उनकी चिंता भावनात्मक नहीं, बल्कि व्यावहारिक है.
सीमित संसाधनों का सवाल: एसटी आरक्षण, छात्रवृत्ति, छात्रावास, वनाधिकार, भूमि संरक्षण जैसी सुविधाएं पहले से ही सीमित हैं. आदिवासी समुदाय आशंकित है कि बड़े जनसंख्या समूह के जुड़ने से उनके हिस्से के अवसर और कम हो सकते हैं.
पहचान की चिंता: आदिवासी समाज अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को “विलीन” होने के खतरे के रूप में देख रहा है.
राजनीतिक उपयोग का डर: उन्हें लगता है कि कहीं यह मुद्दा सामाजिक न्याय से अधिक राजनीतिक विस्तार का औजार न बन जाए. ये आशंकाएं भी उतनी ही वास्तविक हैं जितना कुर्मी समाज का इतिहास.
संतुलन ही समाधान है: यह प्रश्न “कुर्मी सही हैं या आदिवासी” का नहीं है. यह प्रश्न है कि इतिहास की गलती को कैसे सुधारा जाए, बिना किसी दूसरे के अधिकार को कमजोर किए. यदि कुर्मी समाज का ऐतिहासिक दावा सत्यापित होता है, तो समाधान यह होना चाहिए कि आदिवासी आरक्षण को कमजोर न किया जाए, बल्कि संसाधनों का दायरा बढ़ाया जाए और एसटी के भीतर उप-श्रेणीकरण जैसे विकल्पों पर गंभीर विचार हो.
निष्कर्ष: कहा जा सकता है कि कुड़मी समाज की मांग केवल “नया अधिकार” नहीं, बल्कि “छिन गए अधिकार की वापसी” के रूप में देखी जानी चाहिए. वहीं, आदिवासी समाज की चिंता “अधिकार छिनने के डर” की आवाज है. सच्चा सामाजिक न्याय वहीं संभव है, जहां इतिहास की गलती सुधरे, पर किसी और का वर्तमान न बिगड़े. आज असली सवाल यह नहीं है कि “कुर्मी एसटी क्यों बनें?” बल्कि यह है कि “क्या हम इतिहास की गलती सुधारते समय सामाजिक संतुलन बनाए रखने का साहस दिखा पाएंगे?”



