ममता सरकार को SC की चेतावनी: ‘चुनाव आयोग नहीं तो ट्रेनिंग देने की जिम्मेदारी किसकी?’

मुंबई 

सुप्रीम कोर्ट ने  पश्चिम बंगाल सरकार को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को पूरा करने में देरी करने के उद्देश्य से बार-बार 'अस्पष्ट और अप्रासंगिक' कारणों के साथ अदालत का दरवाजा खटखटाने पर राज्य सरकार के प्रति गहरी नाराजगी जताई। गौरतलब है कि इस मतदाता सूची की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड और ओडिशा से न्यायिक अधिकारियों को तैनात किया है।

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की सख्त टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने राज्य सरकार को फटकार लगाते हुए कहा- कृपया अस्पष्ट कारणों के साथ अदालत में न आएं और प्रक्रिया में देरी करने की कोशिश न करें। हर दिन कोई न कोई बेमतलब का बहाना नहीं हो सकता। इसे अब खत्म होना चाहिए। उन्होंने आगे कहा- हमने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर (संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए) उन न्यायिक अधिकारियों की तैनाती का निर्देश दिया है, जो काम मूल रूप से चुनाव आयोग (EC) के अधिकार क्षेत्र का है। लेकिन आप (राज्य सरकार) बेवजह की शिकायतें कर रहे हैं।
कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग पर लगाए आरोप

 रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत की यह टिप्पणी तब आई जब पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने सीजेआई और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष गंभीर आरोप लगाए। सिब्बल ने कहा कि अजीब चीजें हो रही हैं। उन्होंने दावा किया कि चुनाव आयोग के अधिकारी उन न्यायिक अधिकारियों को ट्रेनिंग दे रहे हैं (जिन्हें कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा तैनात किया गया था) कि मतदाताओं के दावों के साथ जमा किए गए किन दस्तावेजों को स्वीकार किया जाना है। सिब्बल ने तर्क दिया कि यह सुप्रीम कोर्ट के उस निर्देश का उल्लंघन है, जिसमें कहा गया था कि इसके 'तौर-तरीके' कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा तय किए जाएंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने सिब्बल की दलील को किया खारिज
पीठ ने बंगाल सरकार द्वारा आए दिन इस मुद्दे को उठाए जाने पर नाखुशी जताई। अदालत ने सिब्बल की दलीलों से असहमति जताते हुए स्पष्ट किया- जब हमने कहा था कि हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश तौर-तरीके तय करेंगे, तो हमारा मतलब यह था कि वह यह तय करेंगे कि किस न्यायिक अधिकारी को कहां तैनात किया जाएगा और उन्हें क्या सुविधाएं दी जाएंगी। दावों का निपटान और मतदाताओं द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों की वैधता पर निर्णय केवल न्यायिक अधिकारी ही लेंगे।

जस्टिस बागची का स्पष्टीकरण और मुख्य सचिव का मुद्दा
जस्टिस बागची ने स्थिति साफ करते हुए कहा- अगर चुनाव आयोग के अधिकारी न्यायिक अधिकारियों को ट्रेनिंग नहीं देंगे, तो और कौन देगा? हमारा आदेश दिन के उजाले की तरह साफ है। हमने SIR की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए न्यायिक अधिकारियों को एक ऐसी जिम्मेदारी दी है जो उनके सामान्य कामकाज से अलग है। राज्य सरकार और चुनाव आयोग दोनों को मिलकर उनके लिए काम करने का अनुकूल माहौल बनाना चाहिए।

इस दौरान, खुद को बचाव की मुद्रा में पाते हुए कपिल सिब्बल ने कहा कि राज्य की मुख्य सचिव भी अदालत में मौजूद हैं क्योंकि दुर्भाग्य से चुनाव आयोग द्वारा उनके खुद के मतदान के अधिकारों पर सवाल उठाया जा रहा है।

पीठ का अंतिम निर्देश
इस पर पीठ ने निर्देश दिया- अपने मुख्य सचिव से कहें कि वह SIR को शीघ्र पूरा करने के लिए चुनाव आयोग और न्यायिक अधिकारियों के साथ मिलकर काम करें। अंत में सिब्बल ने अदालत से यह भी मांग की कि 28 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने के बाद, जैसे-जैसे न्यायिक अधिकारी मतदाताओं के नामों को शामिल करने का फैसला लें, चुनाव आयोग को 'पूरक मतदाता सूची' भी प्रकाशित करनी चाहिए। इसके जवाब में पीठ ने स्पष्ट किया कि SIR की प्रक्रिया पूरी तरह से अदालत के आदेशों के अनुसार ही की जाएगी, जिसमें यह पहले से ही निर्दिष्ट है कि दावों की जांच के लिए किन दस्तावेजों को स्वीकार किया जाना है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button