बंपर उत्पादन से किसानों को राहत: हरियाणा में आलू पर भावांतर योजना का बड़ा फायदा

चंडीगढ़.

हरियाणा में इस समय आलू की फसल का सीजन चरम है, लेकिन खेतों से लेकर मंडियों तक की स्थिति में काफी विरोधाभास दिख रहा है। किसान आलू की फसल के गिरते दामों को लेकर काफी चिंतित हैं, लेकिन लोगों को बाजार में आलू उस हिसाब से सस्ता नहीं मिल रहा, जिस हिसाब से किसानों से खरीदा जा रहा है।

मंडियों में आलू की कम कीमत के चलते काफी किसानों ने कोल्ड स्टोरेज की तरफ रुख किया है, ताकि जून व जुलाई में उन्हें बढ़े हुए रेट मिल सकें। हरियाणा सरकार ने आलू उत्पादक किसानों को राहत प्रदान करने के लिए भावांतर भरपाई योजना लागू की है। इसके तहत 600 रुपये प्रति क्विंटल रेट निर्धारित है। इसका मतलब यह हुआ कि अगर मंडी में किसान का आलू 600 रुपये प्रति क्विंटल से कम दाम पर बिकता है तो उसके नुकसान की भरपाई राज्य सरकार करेगी। इसके लिए आलू उत्पादक किसान का मेरी फसल-मेरा ब्योरा पोर्टल पर पंजीकरण जरूरी है। भावांतर भरपाई योजना की शुरुआत से लेकर अब तक राज्य के तीन लाख 15 हजार 614 आलू उत्पादक किसानों ने स्वयं को पोर्टल पर पंजीकृत कराया है।

राज्य के इन किसानों ने फसल उत्पादन के लिए सात लाख एकड़ भूमि को पंजीकृत किया है। अब तक राज्य के 24 हजार 385 आलू उत्पादक किसानों को 110 करोड़ रुपये का लाभ भावांतर भरपाई योजना के अंतर्गत मिल चुका है। भावांतर भरपाई योजना के अंतर्गत 21 बागवानी फसलों में लाभ दिया जाता है। इनमें 14 सब्जियां, पांच फसल और दो मसाले शामिल हैं। किसानों का कहना है कि यदि भावांतर भरपाई योजना में आलू की फसल शामिल नहीं होती तो उनके लिए मुश्किल हो जाता।

राज्य की मंडियों में इस समय आलू की फसल 200 से 500 रुपये प्रति क्विंटल बिक रही है। सफेद आलू के दाम काफी कम हैं, जबकि लाल व डायमंड रंग के आलू के दाम सफेद आलू से अधिक मिल रहे हैं। हरियाणा में किसानों की आलू उत्पादन की लागत आठ से नौ रुपये प्रति किलो आ रही है, उस हिसाब से मंडियों में उन्हें दो से छह या अधिकतर सात रुपये किलो ही भाव मिल पा रहा है, जिससे किसान काफी आहत हैं। उनकी लागत भी पूरी नहीं हो पा रही है।

मार्च के महीने में हरियाणा की कुछ मंडियों में आलू का रेट दो रुपये किलो तक भी पहुंचा, जिसके विरोध में कुछ किसान सड़क पर आलू फेंककर प्रदर्शन कर चुके हैं। इस सीजन में फंगल डिजीज से कुछ इलाकों में फसल की गुणवत्ता प्रभावित हुई है। महेंद्रगढ़ जैसे जिलों में किसान अब सीधे पेप्सिको और हाइफन जैसी कंपनियों के साथ अनुबंध कर रहे हैं, जहां उन्हें 10 से 12 प्रति किलो का निश्चित रेट मिल रहा है, लेकिन ऐसी स्थिति राज्य के हर जिले में नहीं है।

हरियाणा में आलू की खेती अब दो रास्तों पर
हरियाणा में आलू की खेती अब दो रास्तों पर खड़ी है। एक तरफ वे किसान हैं जो पारंपरिक आलू उगाकर मंडी के उतार-चढ़ाव में फंस रहे हैं, और दूसरी तरफ वे जो बीज उत्पादन या प्रोसेसिंग वैरायटी (चिप्स वाला आलू) उगाकर अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। हरियाणा देश के प्रमुख आलू उत्पादक राज्यों में नौवें स्थान पर आता है। राज्य में आलू की खेती मुख्य रूप से कुरुक्षेत्र, यमुनानगर, करनाल, अंबाला और अब दक्षिण-पश्चिमी जिलों जैसे महेंद्रगढ़ में बड़े स्तर पर हो रही है।

हरियाणा में इस बार साढ़े सात लाख टन आलू के उत्पादन का अनुमान है। करनाल का 'आलू प्रौद्योगिकी केंद्र' शामगढ़ हरियाणा को 'सीड पोटेटो हब' के रूप में विकसित कर रहा है। यहां एरोपोनिक्स (हवा में आलू उगाना) जैसी तकनीक से वायरस-मुक्त बीज तैयार किए जा रहे हैं।

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