
जयपुर
देश के 51 शक्तिपीठों में शुमार जगतजननी मां अम्बा का यह इकलौता ऐसा शक्तिपीठ है, जो भौगोलिक रूप से दो स्थानों पर एक समान आस्था के साथ पूजा जाता है। एक सिरोही जिले में पिंडवाड़ा के समीप स्थित मूल 'आरासुरी अंबा माता मंदिर' और दूसरा गुजरात सीमा पर स्थित विश्वप्रसिद्ध शक्तिपीठ अंबाजी।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, जब भगवान शिव सती के पार्थिव देह को लेकर ब्रह्मांड में भ्रमण कर रहे थे, तब मां पार्वती का पावन 'नाभि' अंग आरासना की इसी सुरम्य पहाड़ी पर गिरा था। आज भी दोनों ही धामों पर मां के नाभि स्वरूप की उपासना होती है।
भारतीय इतिहास संकलन समिति के प्रांत उपाध्यक्ष एवं इतिहासकार डॉ. उदयसिंह डिंगार के अनुसार, आरासना अंबाजी देश के प्रमुख शक्तिपीठों में विशेष स्थान रखता है। इस धाम की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि मुख्य मंदिर में मां की कोई पारंपरिक मूर्ति नहीं है, बल्कि यहां देवी के नाभिकमल रूपी 'चक्र' की पूजा की जाती है।
त्रिशूल से किया था नरभक्षी आरासुर का संहार
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में इस सुरम्य वनक्षेत्र में आरासुर नामक एक भयानक नरभक्षी राक्षस का भारी आतंक था। स्थानीय जनजीवन की रक्षा के लिए मां शक्ति ने अपने त्रिशूल से उस दैत्य का संहार किया और क्षेत्र में शांति स्थापित की।
इसी से माता का नाम ‘आरासुरी देवी’ पड़ा। वर्तमान मंदिर के पृष्ठ भाग में स्थित पहाड़ी पर आज भी उस प्राचीन स्थल पर त्रिशूल स्वरूप की पूजा-अर्चना की जाती है।
भक्त की पुकार पर चट्टान पर उभरे थे कुमकुम पद-चिह्न
जनश्रुति के अनुसार, माली समाज की एक परम भक्त महिला प्रतिदिन दुर्गम पहाड़ी पर चढ़कर मां के त्रिशूल की पूजा करती थीं। वृद्धावस्था में जब वे अशक्त हुईं और पहाड़ी चढ़ने में असमर्थ हो गईं, तो उन्होंने मां से कातर भाव से प्रार्थना की।
भक्त की अनन्य साधना से रीझकर आदिशक्ति ने पहाड़ी की तलहटी में एक विशाल चट्टान पर कुमकुम के पद-चिह्न ‘चक्र’ के रूप में प्रकट कर दिए। तब से उस चट्टान पर चक्र की उपासना होने लगी। सदियों पुरानी इस परंपरा का निर्वहन करते हुए आज भी उसी माली परिवार के वंशज पीढ़ी-दर-पीढ़ी मंदिर में सेवा-पूजा का दायित्व निभा रहे हैं।
शर्त टूटने से सीमा पर ही स्थापित हो गईं मां
इतिहासकार डॉ. डिंगार बताते हैं कि गुजरात के दांता स्टेट के दरबार मां आरासुरी के अनन्य उपासक थे और हर वर्ष दर्शन के लिए यहां आते थे। उन्होंने मां से दांता पधारने की प्रार्थना की। देवी ने शर्त रखी कि मार्ग में पीछे मुड़कर नहीं देखना। यात्रा के दौरान दांता राज्य की सीमा पर जैसे ही राजा ने संशयवश पीछे मुड़कर देखा, मां की शक्ति वहीं ठहर गई।
इसके बाद दांता दरबार ने उसी स्थल पर भव्य मंदिर का निर्माण करवाया, जो आज ‘दांता अंबाजी’ के नाम से दुनियाभर में विख्यात है। इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के चलते आरासना अंबाजी को ही अंबा भवानी का मूल और आदि प्राकट्य स्थल माना जाता है।



