सीबीआई चार्जशीट को अकेला सबूत नहीं माना जा सकता, हाई कोर्ट ने वेतन कटौती का आदेश किया रद

 रांची
 हाई कोर्ट के जस्टिस दीपक रोशन की अदालत में अलकतरा चालान गड़बड़ी के मामले में सेवानिवृत्त सहायक अभियंता सुरेंद्र प्रसाद की याचिका पर सोमवार को सुनवाई हुई। अदालत ने विभागीय जांच में दी गई वेतन कटौती और सरकारी राशि की वसूली के आदेश को रद कर दिया।

अदालत ने कहा कि विभागीय जांच में केवल सीबीआइ की चार्जशीट या जांच के दौरान जुटाए गए दस्तावेजों को सबूत नहीं माना जा सकता। दस्तावेजों की सामग्री को सक्षम गवाह के माध्यम से साबित करना जरूरी है, ताकि संबंधित कर्मचारी को प्रति परीक्षण का प्रभावी अवसर मिल सके। अदालत ने सुरेंद्र प्रसाद को उन सभी परिणामी लाभों का हकदार माना, जो उक्त दंड आदेश के कारण उन्हें नहीं मिल सके था।

अदालत ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे रिकार्ड की जांच कर परिणामी लाभों की गणना करें और आवश्यक आदेश जारी करते हुए इस आदेश की प्रति प्राप्त होने की तिथि से 12 सप्ताह के भीतर उन्हें लाभ प्रदान करें।

अदालत ने कहा कि विभाग यह साबित नहीं कर सका कि कितनी मात्रा में अलकतरा का कथित कम उपयोग हुआ, उसका मूल्य कितना था। ठेकेदार से कितनी राशि वसूल की जानी थी और सुरेंद्र प्रसाद की व्यक्तिगत जिम्मेदारी के कारण सरकारी खजाने को कितना नुकसान हुआ।

अदालत ने कहा कि बिना प्रमाण और स्पष्ट गणना के वेतन या पेंशन संबंधी लाभों से वसूली नहीं की जा सकती। विभाग ने वर्ष 2015 में सुरेंद्र प्रसाद के वेतन को उनके पद के न्यूनतम वेतनमान तक घटाने और कथित सरकारी नुकसान की आनुपातिक राशि वसूलने का आदेश दिया था।

सुरेंद्र प्रसाद ग्रामीण अभियंत्रण संगठन (वर्तमान में ग्रामीण कार्य विभाग) में सहायक अभियंता के पद पर कार्यरत थे और वर्ष 2019 में सेवानिवृत्त हुए। मामला वर्ष 2004-05 में बानो से पबुरा-निमतुर-पनगुर पथ के निर्माण एवं मरम्मत कार्य से जुड़ा था।

विभाग ने आरोप लगाया था कि ठेकेदार द्वारा अलकतरा की खरीद से संबंधित कथित फर्जी चालानों पर सहायक अभियंता ने काउंटर साइन किया था, जिससे ठेकेदार को अनुचित भुगतान का लाभ मिला और सरकारी खजाने को नुकसान हुआ।

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