‘शेरशाह’ की शहादत को सलाम, पंजाब में बटुए से लेकर बच्चे के नाम तक बसती है वीरता की मिसाल

चंडीगढ़.

पूरा देश 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस का 27वां वर्षगांठ मनाने जा रहा है। इस युद्ध में 527 भारतीय जवान बलिदान हुए थे। इन बलिदानियों में एक नाम हैं कैप्टन विक्रम बत्रा। प्वाॅइंट 5140 फतह करने के लिए कैप्टन बत्रा को भारतीय सेना ने नाम दिया था ‘शेरशाह’।

युद्ध के दौरान कैप्टन बत्रा 7 जुलाई 1999 को प्वाइंट 4875 (बत्रा टाॅप) को दुश्मनों से वापस छीनते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। उनकी इस अद्वितीय वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान 'परमवीर चक्र' से सम्मानित किया। ‘शेरशाह’ को वीरगति प्राप्त किए हुए भले ही 27 वर्ष से अधिक का समय बीत चुका हो लेकिन वह आज भी किसी युवा के बटुए में तो किसी बच्चे का नाम में जिंदा है। अमेरिका में एक मां अपने बच्चे का नाम विक्रम इसलिए रखती है, ताकि वह बड़ा होकर देश के इस वीर सपूत जैसा साहसी बने। कारगिल युद्ध में बलिदानी कैप्टन विक्रम बत्रा की कहानी 27 वर्ष बाद भी लोगों को सिर्फ गर्व नहीं, बल्कि आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रही है।

उनके पिता गिरधारी लाल (जीएल) बत्रा के पास आज भी देश-विदेश से ऐसे पत्र आते हैं, जिनमें लोग बताते हैं कि विक्रम उनके लिए प्रेरणा बन चुके हैं। एक युवक ने लिखा कि जब वह जीवन में निराश होता है तो अपने पर्स में रखी कैप्टन बत्रा की तस्वीर देखकर उसे नई ऊर्जा मिलती है।कैप्टन विक्रम बत्रा के पिता के लिए आज भी वह दिन सबसे खुशी का दिन है, जब उनके बेटे ने प्वाइंट 5140 पर विजय हासिल की थी। सुबह करीब सात बजे विक्रम का फोन आया था। उन्होंने पिता से कहा था, "डैडी, आई हैव रिकैप्चर्ड…आप चिंता मत कीजिए। दुश्मनों ने भारत की जिस 5140 चोटी पर कब्जा कर रखा था, उसे हमने फतेह कर लिया है। यह सुनते ही पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो गया था।

शेरशाह ने विक्रम ने दुश्मन के सात जवानों को ढेर करने के बाद बंकर को नष्ट किया और एंटी एयरक्राफ्ट गन पर भी कब्जा किया। इसके बाद उनका प्रसिद्ध लाइन 'ये दिल मांगे मोर' सामने आई। गिरधारी लाल बत्रा बताते हैं कि विक्रम बचपन से ही सामान्य बच्चों से अलग थे। वह हमेशा दूसरों को खुश रखते थे और देशभक्ति की भावना उनमें बचपन से थी। वह भगत सिंह, वीर शिवाजी और गुरु गोबिंद सिंह की वीरता की कहानियां सुनना पसंद करते थे। केंद्रीय विद्यालय में पढ़ाई के दौरान उनका संपर्क सैन्य अधिकारियों के बच्चों से रहा और सेना के अनुशासन से वह काफी प्रभावित हुए। पिता खुद भी सेना में अधिकारी बनना चाहते थे, लेकिन स्वास्थ्य कारणों से चयन नहीं हो पाया। विक्रम ने सेना में अधिकारी बनकर उनका सपना पूरा किया।

दुनिया की सबसे कठिन लड़ाइयों में से एक
गिरधारी लाल बत्रा की इच्छा है कि कारगिल युद्ध का विस्तृत इतिहास लिखा जाए और उसे स्कूलों में पढ़ाया जाए। उनका कहना है कि यह दुनिया की सबसे कठिन लड़ाइयों में से एक थी, जिसमें भारतीय जवानों ने अदम्य साहस दिखाया। उनकी वीरगाथाएं इतिहास में दर्ज होनी चाहिए।

प्रेरणा लेकर स्टूडेंट्स बन रहे अधिकारी
सेक्टर-10 स्थित डीएवी काॅलेज का नाम भी कैप्टन विक्रम बत्रा जैसे वीर सपूत से जुड़कर गौरवान्वित है। काॅलेज परिसर में बने वार मेमोरियल में उनका नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। इसी संस्थान ने देश को परमवीर चक्र विजेता जैसा वीर सपूत दिया। कैप्टन बत्रा की वीरगाथा आज भी काॅलेज के छात्रों में देशभक्ति का जज्बा जगाती है। उनसे प्रेरणा लेकर 100 से अधिक विद्यार्थी सैन्य सेवाओं में अधिकारी बन चुके हैं।

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